राकेश मिश्र कानपुर

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Rakesh Mishra


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9 Year Old Gives Birth and Kali Yuga of Hinduism

Posted On: 8 Feb, 2013  
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US UK Foreign Aid Tied to India’s Forced Sterilization Campaign

Posted On: 7 Feb, 2013  
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Bizzare Haircuts….

Posted On: 1 Feb, 2013  
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Who created three global economic collapes…?

Posted On: 31 Jan, 2013  
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Kim Dotcom: 'I want to encrypt half of Internet, total govt spying must stop!'

Posted On: 29 Jan, 2013  
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Water is the new gold, a big commodity bet

Posted On: 28 Jan, 2013  
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Companies That Made Money By Wars I

Posted On: 27 Jan, 2013  
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Best Republic Day Gift from a Pakistani to India!!

Posted On: 27 Jan, 2013  
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देश की आम जनता लोक पाल की मांग सरकारी भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए कर रही है. जिस किसी भी सामाजिक, धार्मिक या अन्य किसी भी प्रकार की संस्था को सरकार से किसी भी प्रकार का अनुदान या सहायता मिलती है उसका लेखा-जोखा जांचने का अधिकार सरकार को है. इसके अतिरिक्त यदि ऐसी कोई भी संस्था जो सरकार से नहीं अपितु देश के दानियों या विदेशों से प्राप्त धन से सामाजिक या धार्मिक कार्य कर रही है जिसके लिए उसने सभी प्रकार की पूर्व अनुमति ले रखी है, की निगरानी अन्य दुसरे कानूनों के तहत निगरानी की जाती है. इनका उल्लंघन करने पर इनकी मान्यता समाप्त हो सकती है. अब सरकार ने सभी एन.जी.ओ. को लोकपाल के दायरे में लाने का प्रस्ताव बदले की भावना से लिया है क्यूंकि देश इतना बड़ा जन आन्दोलन इन्हीं की बदोलत करने में सफल हो सका. सो सरकार इन सभी को बांधने का साधन तैयार कर रही है. अन्यथा इनको लोकपाल के दायरे में लाने का क्या औचित्य ? जिस प्रकार के आरोप आपने अरुण जेटली पर लगाये हैं ऐसे आरोप तो संसद में सभी पर लग सकते है प्रस्ताव लाने वाले पर भी और इसका विरोध करने वाले पर भी. मीडिया पर भी और इस प्रकार से सवाल उठाने वालों पर भी . राजनैतिक दलों के खूंटों से बंधे इस देश के लोग कभी दलों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता से ऊपर उठ कर भी सोचेंगे ? मुझे तो लगता नहीं.....!

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ठलुआ क्लूब के संस्थापक बाबु गुलाब रॉय ने ठलुआ कौन है और उसकी क्या-क्या विशेषताएँ हैं, यूँ परिभाषित किया है - १- दुखी हों, किन्तु रोयें नहीं, रोयें भी तो रोने में हसने का आनंद लें. २- अपने सिवाय सारे संसार को मूर्ख माने. धन कमा लेने के कौशल को  मूर्खता नहीं तो कमसेकम धूर्तता समझें. ३- भूखों मरते हों किन्तु स्वभिमानवश भीख के लिए हाथ न पसारें . पसारें भी तो अपने दाता की ओर सिंह के सामान गुर्राते रहें. ४- धनवान हों तो इतनी की बिना हाथ-पैर चलाए घर में सोने-चांदी के ढेर लगे रहें  किन्तु हिसाब-किताब करते समय उनका सर दर्द करने लगे. ५-विद्वान हों किन्तु अपने आदर, सम्मान की आकांछा न हो. ६- नौकरीपेशा हों, जिनकी नौकरी छूट गई हो अथवा छूटने वाली हो और उनके भविष्य में नौकरी मिलने की आशा भी न हो तो भी मस्त हों. ७-बीमार हों किन्तु  शेयासेवी न हों, आसन्न मृत्यु न हो, परन्तु जीने की भी पक्की आशा न रखते हों. ८- बातूनी हों, पेट भरने लायक कमाने की धूर्तता रखते हों किन्तु रुपया - पैसा कमाने की बात करना असभ्यता संझ्तेय हों. ९- ठंडाई -भांग के शौक़ीन हों.न चांटे हों तो बुरा भी न माने.

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@Puja ji... इस आदमी की अपनी पहचान यह है कि इन्होने अपनी जिंदगी के 5 दशक सच के नाम कर दिए हैं . देशभक्ति नाम और पहचान की मोहताज नहीं हुआ करती है . और जो कहते हैं की यह लेख प्रायोजित है वे शायद सच को स्वीकार करने और अनुसन्धान करने की हिम्मत नहीं रखते. विदेशी प्रायोजित नाटकों से भारतीय भ्रष्टाचार दूर होगा यदि आपकी सोच ऐसी है तो यह नितांत दुखद है... शायद हम मानसिक विपन्नता की उस दशा में पहुँच चुके हैं की हमे देश के लिए आटे, तेल, चावल यानि राशन से लेकर हवाई जहाज और सामरिक उपकरण तक जब विदेश से खरीदते हैं तभी समझ आते हैं. व्यक्ति और व्यवस्था (सरकार) की सही व्याख्या भी जब विदेशी प्रायोजित मीडिया करता है तभी सुझाई पड़ता है.

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साधना जी, बकवास लेख है.... कतई विश्वसनीय नहीं है... ये लोग जो लिख रहे हैं खुद कौन है...? अन्ना की इतनी जासूसी कर किसके इशारे पे रहे हैं रहे है? इतनी जासूसी हमारे सांसदों की करते तो सीबीआई को बहुत मदद मिलती... बात वही है, लोगों ने भगवान राम को भी नहीं बख्शा था, अन्ना क्या हैं...? ये सभी लेख प्रायोजित दिखते हैं, जिस धुएँ को आप देख रही हैं वो रासायनिक क्रियाओं द्वारा पैदा किया जा रहा है ताकि लोगों को गफलत हो कि धुआँ है तो आग भी होगी... ये आंदोलन सड़ी गली व्यवस्था के बदलाव की और पहला कदम भर है और उसी परिप्रेक्ष्य में इसे देखना चाहिए.... और वो जिन्हें अन्ना स्वीकार नहीं हैं, उन्हें बातें छोड़ के खुद मैदान में आना चाहिए.... अगर उनमे दम है तो वो बन जाएँ नायक... किसने रोका है...??

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आप खिलाफ हो भी तो कोई खास फर्क पड़ता नहीं.... आदमी लाख इमानदारी से अपना काम करे, लेकिन सभी लोगों को सहमत नहीं किया जा सकता...मेरा व्यक्तिगत मत है बातें मैं खुद भी बहुत कर लेता हूँ लेकिन मैदान में आ के कुछ काम करने वाले कर्मयोगियों की बहुत क़द्र करता हूँ.... ये जो लोकतान्त्रिक तरीके से चुनाव लड़ने की बात है ना वो तर्क का एक झुनझुना भर है कि लो पकडो इसे और बजाओ.... आज चुनाव पैसे और गुंडागर्दी से जीता जाता है जिसमे अन्ना टीम हमारी राजनीतिक पार्टियों के मुकाबले कहीं नहीं टिकती... तो पहले माहौल तो बनाएँ न कि चुनाव ईमानदार लोग भी जीत सकें.... तो जनलोकपाल बिल से कम से कम कुछ मदद तो मिल ही जायेगी... सरकार को झुकाना लुंज पुंज लोगों का काम नहीं है, कुछ दम ख़म चाहिए होता है वरना रामदेव को भी अपने देखा ना...अब कानूनों की आड़ ले के पूरा मोर्चा खोल दिया उसके खिलाफ कि आगे कभी सर न उठाये....

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अभी तो शुरुआत है..... अभी पूरा समर शेष है.... अगर आप में भी कुछ दम ख़म है तो बातें छोड़ के मैदान मैं आइये...देश को कर्मयोगियों की ज्यादा ज़रूरत है.... एक 74 वर्षीय बुजुर्ग 13 दिन भूख बर्दाश्त कर के अपना काम कर के चला गया..अब बुद्धिजीवी लोग ऑपरेशन करते रहेंगे, कई वर्षों तक जुगाली करने का मसाला मिल गया है... यकीनन एन जी ओज में बहुत भ्रष्टाचार व्याप्त है...लेकिन एक राजा, कलमाड़ी, येदुरप्पा वो लुहार हैं जो अकेले इन सौ सुनारों पे भारी हैं.... ये बदलाव की शुरुआत भर है.... 64 साल से बिगड़ा है तो वक्त तो लगेगा न सुधरने में.... एन जी ओ वाले भी बच के कहाँ जायेंगे.... और अभी तक मेरे पास अन्ना या केजरीवाल पर संदेह करने का कोई कारण भी नहीं.. लेकिन सरकार, संसद, लोकतंत्र, कानून जैसे झुनझुनों पे संदेह करने की ढेर सारी वजहें हैं.... कुछ बुद्धिमान ये सवाल भी उठा रहे हैं पैसा कहाँ से आया, तो ये जानने में भी मेरी कोई रूचि नहीं, और अधिकार भी नहीं,सही प्रयोजन के लिए वेश्याओं से भी लिया धन भी गंगाजल की तरह पवित्र है.....

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राकेश जी ,.. मैंने आपके पोस्ट किये कई लेख पढ़े ,..मैं भी अन्ना समर्थक हूँ और कुछ शंकाओं के बाद भी,.इस आन्दोलन को सफल करने के लिए काम कर रहा हूँ ,.आपको अपने विचारों से जरूर अवगत करना चाहूँगा दरअसल जनता भ्रष्टाचार से बहुत पीड़ित है और लगातार अपनी अनदेखी से उसका गुस्सा सातवें आसमान पर है , जिसे आपने बहुत गलत संज्ञा दे दी है,..विपक्षी पार्टियाँ भी जनता को संतुष्ट नहीं कर सकी ,.. .. मैं इस बात को मानता हूँ कि इस आन्दोलन में कई भ्रष्टाचारी भी शामिल होंगे ,...लेकिन ऐसा लोकपाल समय की जरूरत है जो जनता की आकाँक्षाओं को पूरा कर सके ,..अन्ना हमारे सर्वमान्य महानायक हैं उनके नेतृत्व में जनता एकजुट हो गयी है ,.जिसे रोकना समय को रोकने जैसा होगा ... यदि टीम अन्ना के इरादे गलत भी होंगे तो सामने आयेंगे ,..ये पुब्लिक है सब जानती है ,..एसा भी नहीं है कि NGO की जांच नहीं हो सकती उसके लिए तो सरकारी तंत्र है ही ,.यदि गड़बड़ हुई तो उजागर भी होगी ,..मेरी समझ में यह नहीं आता कि ये सवाल अब क्यों प्रमुखता से उठाया जा रहा है??? ...जिसको आपने महत्वाकांक्षा नाम दिया है तो टीम में कुछ लोगों की हो भी सकती है ,..लेकिन ज्यादातर लोगों के लिए समर्पण शब्द उचित होगा आपने लोकतंत्र पर भी सवाल उठाया है ,.तो मुझे बिलकुल भी नहीं लगता कि इसपर किसी प्रकार का खतरा है ..लेकिन यह सबक जरूर होगा आने वाली सरकारों के लिए,.....एक बात का उल्लेख कोई नहीं कर रहा है कि जनमानस को जगाने में बाबा रामदेव ने उल्लेखनीय काम किया है ,..धन्यवाद http://santo1979.jagranjunction.com/

के द्वारा: Santosh Kumar Santosh Kumar

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कग्रेश गंभीर नही ये बात सही ह, फिरोज खान रिस्वात लेकर लाइसेंस बेचता था ओर इसके सारे सबूत सरदार पटेल ने नेहरु को दिए थे फिर भी वो चुप रहे ( as per mani ben dayari / सरदार पटेल कि बेटी मानिबेन) रिश्वत खोरि कग्रेश कि जड़ में ह ये बात भी सही ह किंतु बलिदान ओर बालिदानियो कि बात कराने वाला शुभास ओर भगत सिहा का नाम लेने वाला रामदेव जब समय आया तो औरतों के कपड़े पहन कार भाग निकाला ये क्या..........??????????????????????? सामाजिक बदलाव येसे कायरो के बस कि बात नहीं गीता में भगवान कहते ह कि यदी तू मारा तो स्वर्ग मिलेगा जीता तो रज्य ओर कीर्ति किंतु यदि तू युद्ध से भाग लिया तो उपकिर्ति को प्राप्त होगा मुझे हैरत ह रामदेव सन्यासी होकर इतनी बात नहीं समझ पाया ,इसका मतलब क्या ह ..क्या दिग्गी सही ह कि रामदेव लोगो को बेवकूफ़ बना रहा ह ???पुरी के शंकराचार्य जी के अनुसार अब रामदेव भगवा पहनने का अधिकारी नही क्योकि उसने संन्यास धर्म कि महिमा को कलंकित किया ह

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By the time our highly preoccupied ,busy chief minister will have time to see all this ,everything will be covered up by the minister in-charge of Agriculture Deptt.,Bihar. As I have learnt he has already set his dogs to gather sample of Dhaincha Seeds from all the block head-quarters (may be on papers )and will get all these samples tested positive for them to be branded as no. one quality seeds. भाई हमलोग दो न. के आदमी हैं और मारवाड़ी भी |देश की सत्ता पर तो इन्ही लोगों की काबिज होने की मोनोपोली है |हम मारवाड़ी हों के नाते कभी देश का अच्छा सोच ही नहीं सकते हैं |इस मंत्री के हिसाब से ये सोच रहे हैं की बाबू अभय सिंह इन्ही के पुत्र थे इसलिए इन्होने कोई भी इन्क्वारी नहीं होने दी उनके रहस्मय तरीके से दिवंगत होने पर,क्योंकि वे इनके पुत्र थे |क्या हमारे देश का कानून इसकी इज़ाज़त देता है | आप मुझे बतलाइए अगर अभयजी कहीं अन्यत्र याने होटल में, किसी घूमने जाने के स्थान पर वे इस तरह का अगर कर लेते तो यही मंत्री ताल ठोक कर कितने ही निरीह आदमियों को इस मामले में फंसा देता और जमीं आसमान को एक कर देता इन्क्वायरी करवाने में |चूँकि अभयजी एक दबंग मंत्री के पुत्र हैं और उनके मरणोपरांत इनकी दबंगता के मद्देनज़र कोई police enquiry नहीं होना अपने आप में एक रहस्य है | दिनकर जी की एक कविता है जिसका कुछ अंश यहाँ लिख रहा हूँ | "जब नाश मनुज पर छाता है ,पहले विवेक मर जाता है " भगवन श्री कृष्ण ने कौरवों से कहा था की "अगर न्याय करो तो आधा दो, उसमे भी कोई बाधा हो ,तो देदो सिर्फ पांच ग्राम " मेरा कहना है की इस आदमी पर नाश के काले ब्बादल जरूर छाएंगे , इसको मालूम नहीं पड़ रहा है ,अगर छा भी गए हो तब ,अभी तो यह मंत्री पद के मद में चूर है ,भगवान इसको छोटा दिखाई पड़ रहे है |इसको ज्यादा अभिमान इस बात का है की सब कुछ जानते हुए मुख्य मंत्री इसका कुछ नहीं बिगाड़ पा रहे |इसको दूसरा नशा यह है की इस बार इसके साथ दो पुत्र भी इस बार विधायक बन गयें हैं |इसलिए यह बिहार विधान सभा का एक नायाब मेंबर हो गया है | मैं तो इससे न्याय मांगने गया था |मैंने इतना ही कहा ही था की आपके विभाग ने और संजय सिंह ने जान -बूझ कर एक साजिश के तहत बिहार राज्य अंतर्गत सभी मिश्रित दानेदार खाद इकाइयों को बंद करवा दिया है और वहीँ बिहार के बाहर पश्चिम बंगाल की एक फैक्ट्री को उनके द्वारा उत्पादित इसी तरह के मिश्रित खाद को विपणन करने का Marketing right बिहार में मार्केटिंग करने के लिए दे दिया गया है |यह हमलोगों के साथ गैर इंसाफी हुई है |तब इसी मंत्री ने कहा की "तुमलोग तो खुद २ न. के आदमी हो "| आप सोच सकतें हैं महानुभाव की यह आदमी अपने मंत्री पद का दुरुपयोग सिर्फ ढैंचा बीज खरीद मैं,micronutrients purchase मैं ,कृषि यंत्रों के rate fixation में ही नहीं ,ये किसी भी बनिए को माँ बहन की गाली भी दे सकता है |मेरे लिए तो इतनी बात सुनने के बाद ,चुल्लू भर पानी में डूब मरने की बात हो गयी |इस आदमी को क्या हक था की हमलोगों को यह दो न. का आदमी कहे | माननीय मुख्य मंत्री जी से मेरी करबद्ध प्रार्थना है की क्या इस मंत्री को ऐसी भाषा बोलने की ये इजाजत देंगे या कोई माकूल action लेंगे | मैंने पहले भी कह दिया है की जिस कदर कृषि विभाग के एक पागल आफिसर संजय सिंह ने हम् लोगों पर गलत तरीके से उर्वरक अधिनियम के अनुबंधों की व्याख्या कर जुल्म किया है , फैक्ट्री बंद करवा दी है ,हमलोग तो आँख से आंसू बहते हुए अपने बाल-बच्चों के साथ वापस राजस्थान चले जायेंगे , लेकिन आप और आप के ये बंधू बांधव (आफिसर और आपके मंत्री) किसी बिहारी से मत भीड़ जाइयेगा ,नहीं तो वो तो बिहार का ही होगा न ,वो आपके इन बंधू-बांधव ऑफिसर और मंत्री जी को ठीक से समझा देगा की बिहारी क्या होता है | इनके ऑफिसरों के जुल्म के मद्देनज़र ,भाई साहब , कम से कम अदानी ग्रुप को मना कीजिये की बिहार में कोई उद्योग न लगाए , नहीं तो पैसा (इन्वेस्टमेंट) तो उसका होगा लेकिन यह पैसा लगाने के बाद बिहार सरकार का एक चपरासी से लेकर इनके ऑफिसर ,मंत्री सब इस पैसे के मालिक हो जायेंगे | और अदानी जी देखते रह जायेंगे | और उप मुख्य मंत्री जी कहेंगे की "मैं इस मामले में कुछ नहीं कर सकता |आप उसी विभाग के मंत्री के पास जाइये जिस विभाग की परिधि में आपकी फैक्ट्री आती है "|मेरे साथ ऐसा हो चूका है ,चार दिन पहले उप मुख्य मंत्री जी के जनता दरबार में अपने बूढ़े पिताजी के साथ गया था |मोदी जी ने कहा मैं इस मामले में कुछ नहीं कर सकता ,आप नरेन्द्र बाबू के पास ही जाइए |" तब हुज़ूर ,बहुत अच्छा शासन है |सुशासन है |

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गाँधीजी सेक्सि आदमी थे ये तो उन्होंने ख़ुद स्वीकार किया ह ओसो कहते ह बिना सेक्स का पूरा मजा लिए कोई संत होही नहीं सकता जन्म जन्म कि यात्रा सेक्स कि यात्रा ह ओर जब आदमी एक दिन सेक्स से उपरांत हो जाता ह सेक्स से ऊपर उत जाता ह तब वो संत होता ह येहि सेक्स से समाधि कि ओर जाना ह कग्रेसियो (खासकर नेहरु ने) भारत कि सता को अपने परिवार के लिए रिजरव कराने के लिए गाँधी का उपयोग किया ओर गाँधी कि मौत के बाद उसे वो बना दिया जिसकी उनकों जरूरत थी,,गाँधी समान्य आदमी थे कोई संत महात्मा नहीं ओर आजादी कि लड़ाई में उनका योगदान शुभास अन्य किसी से अधिक नहीं था किंतु शुभास ओर अन्य कग्रेसि नहीं थे इसलिए गुरिल्ला बनाकर राह गए ओर मोहन करमचंद रस्त्रा पिता हो गए यही इस देश कि विडंबना ह

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कुछ लोग यह प्रश्न कर सकते हैं कि आपने क्या किया? उन सभी महानुभावों से मेरा निवेदन है कि व्यक्ति और समाज दोनों के सन्दर्भों में सीमाओं और संसाधनों का भी जरुर ध्यान रखें... बेशक आलोचना करें.. लेकिन गहनता से पड़ताल जरुर करें. व्यक्ति आधारित विवेचना में हम स्थायी समाधानों के उपायों को अनदेखा कर देते हैं. यह एक सामान्य प्रक्रिया है. लेकिन यह कभी-कभी पराजयवाद का प्रथम चरण भी बन जाती है.... बेहतर होगा की हम व्यवस्था आधारित समाधानों की तरफ रुख करें. जहाँ तक इस वृद्धा महिला या रस्तोगी जी या उनके जैसे असहाय और दुर्व्यवस्था शिकार लोगों का प्रश्न है तो मेरे या आपके व्यक्तिगत प्रयासों से क्या कोई स्थायी समाधान निकल सका है? इसके लिए शायद बेहतर समाधान किसी सीमित संसाधन वाले व्यक्ति की हैसियत ही नहीं है. यहाँ पर स्थायी व्यवस्था की जरुरत है... शायद इस व्यवस्था के ठेकेदारों को फिर से सोचना होगा. या हमे और आपको मिल कर नयी और बेहतर स्थायी व्यवस्था बनानी होगी.

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मेरी बहस प्रायः इशी लिए होती है फेयर एंड लवली का जब ऐड आता है टीवी में तो दिखाया जाता है की ६ हफ्तों में बिलकुल आप सफ़ेद हो जायेंगे उस ऐड में ३-४ बिटिया भी दिखाई जाती है जब उसको ख़रीदा जाता है तो उश्के अंदर एक पर्चा निकालता है जिसमे उसको यूज करने की विधि लिखी रहती है यह विधि ऐशी होती है शायद ही कोई व्यक्ति ही फालो कर सके और कोई भी गोरा नहीं होता मेरा पिता जी बहुत दिनों से इस क्रीम का प्रयोग कर रहे है वो भी दिन में ३-४ बार लेकिन सफ़ेद न हो पाए ये लूट प्रक्रिया कब तक चलती रहेगी इश्को व्यापारिक प्रतिबंधित व्यव्हार कहा जाता है हमारे समाज को एड्स से बचने के लिए कंडोम का प्रचार एवं प्रसार क्यों किया जाता है की विदेशी माल बिकना चाहिए साला अगर एड्स से समाज को बचाना है तो प्रचार और प्रसार यह करना चाहिए की परस्त्री गमन न किया जाये परिवार एवं स्वस्थ्य मंत्रालय की और से जनहित में जारी ये कोई नहीं बताएगा न ऐड आएगा कंडोम का ऐड कही भी आप दे सकते है अब तो हद ही पार हो गयी है केला, लीची,संतरा, आम के स्वाद का कंडोम भी आने लगा है जैसे कंडोम को मुह में यूज़ करना हो वह पर स्वाद की क्या आवश्यकता है??? बड़ी विडम्बना है इश देश की विदेशी लोग जो मन आता है बेच जाते है भारतीयों को डरा - धमका के हम लोग लबलाहे कुत्ते ऐशे वो चीज़ को फलो करना चालू कर देते है

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प्रतिभा दी.. ...इस विषय के खिलाफ मै कई दिनों तक बात कर सकता हूँ .. यदि आप भारत को भारत मान कर चलते हैं तो भारतीय संस्कृति के इतिहास में कोई एक ऐतिहासिक तथ्य बता दीजिये जहाँ आपने समलैंगिकता का जिक्र पाया हो ? और यदि लाखों सालों से हम सनातनी संस्कृति से ससम्मान जीते चले आ रहे हैं तो वर्तमान में अप्राकृतिक यौनाचार की वकालत क्यों ? ... और जहाँ तक मानव जीवन की बात है ... हमारे शास्त्रों में जीवन और "काम" की व्याख्या विश्व के किसी ग्रन्थ से कही ज्यादा उचित और वैज्ञानिक तरीके से की गयी है ... वात्सायन ने भी पूरी कामसूत्र लिखी लेकिन उसमे कहीं भी समलैंगिकता की वकालत नहीं की है . और जिस यौन शिक्षा को आप घर के अन्दर की बात बता रही हैं वो शायद सांस्कृतिक परंपरा का एक हिस्सा है ... स्कूलों में इसके प्रसार से क्या नतीजे हो सकते हैं ... आप अंदाज़ा लगा सकती हैं ... हो सकता है आप धार्मिक ग्रंथों और वेदों को अप्रमाणिक कह दें, लेकिन देश काल परिस्थितियों के मानव मष्तिष्क पर प्रभाव में प्रेरण और उद्दीपन के मनोविज्ञान के मुलभुत नियम को दरकिनार करके आप किस पैमाने से सामाजिकता का मूल्याङ्कन कर रही हैं?

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राकेश आपने जो कुछ लिखा है उसमें से दो बातों को छोड़ कर बाकी सभी बातों से मैं सहमत हूं। जिस तरह समाज में बाल यौन शोषण की समस्याओं में वृद्धि हुई है उसे देखते हुए बच्चो को यौन शिक्षा का ज्ञान देना और शोषण होने की स्थिति में उससे प्रतिकार करने के तरीकों के बारे में बताना बेहद आवश्यक है। क्योंकि शिक्षा के अभाव में कई बार वे यह ही नहीं समझ पाते कि उनके साथ हुआ क्या है या हो क्या रहा है। और क्या इस कुकृत्यी को सजा कैसे दिलायी जा सकती है। इन सभी बातों का ज्ञान बच्चों को होना ही चाहिए। हां, स्कूल की बजाय यह शिक्षा यदि उन्हें अपने घऱ में बड़ी बहन, भाभी या मां के द्वारा दी जाए, तो बेहतर होगा। रिश्तों में एक बॉन्डिग बनेगी और वे अपने मन की बात सहजता से कह पाएगें। दूसरी बात समलैंगिक संबंधों की तो ये भारत में नए नहीं है। सिर्फ मान्यता को लेकर विवाद जरूर है। मेरा तो यही मानना है कि यह एक बेहद निजी मामला है। हम और आप कौन होते है किसी के निजी मामलों दखलंदाजी करने वाले। इस देश ने हर व्यक्ति को अपने ढंग से ज़िंदगी जीने का अधिकरा दिया है, तो जीने दीजिए उन्हें अपने तरीके से।

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आज प्रायः बहस होती है की उच्च शिक्षा में गुणवत्ता का संवर्धन कैसे किया जाये ? सबसे पहले यहाँ यह विचार आवश्यक है की उच्च शिक्षा में गुणवत्ता कौन लाता है तो उत्तर होगा एक योग्य शिक्षक, तो मेरा मानना है की अगर सच में विकाश की बहार लानी है तो पहले उच्च शिक्षा को न देखे पहले प्राथमिक शिक्षा में गुणवत्ता लाने का प्रयाश करे क्यों की जो भी शिक्षक बनता है वो पहले तो प्रथिमिक शिक्षा ही ग्रहण करता है अगर हमारी प्राथमिक शिक्षा ही गुणवत्ता पूर्ण नहीं रही तो अछे शिक्षक कैशे बनेंगे और मेरे अनुसार प्रथिमिक शिक्षा सैधांतिक कम होकर व्यवहारिक ज्यादा होनी चाहिए जिशसे हम छात्रो को मूल्य परक शिक्षा प्रदान करे जिशसे हम उनके नैतिक मूल्यों का संवर्धन करे तो ही उच्च शिक्षा में गुणवत्ता संभव है , नहीं तो आज के परिप्रेश्य में शिक्षा कहा है और आगे खा जाएगी पता नहीं चाहे कुछ भी कर लिया जाये खाना खिला देने से कुछ नहीं होने वाला है एक व्यापक रूप से अभियान चलाना होगा तभी शिक्षा संभव है ,

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शिक्षा, चरित्र और संस्कार की कहानियां गढ़ने वाले ज्यादातर महापुरुष इसका वास्तविक अर्थ और शिक्षा से इसका सम्बन्ध कैसे लगा रहे हैं.. यह विरोधाभासी एवं विचारणीय है. विरोधाभास की वजह हमारी प्राथमिक शिक्षा में जीवन की उत्पत्ति डार्विन, और ओपेरिन ने हमे "योग्यतम की उत्तरजीविता" "सुव्यवस्थित" और "तथाकथित वैज्ञानिक" ढंग से सिखाई है., और जो थोडा बहुत लंगड़ा लूला सनातनी ज्ञान हमे मिल गया वह हमारी मिथ्यभासी धार्मिक ग्रंथों से... (जी हाँ यही वास्तविक स्थिति है धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत का.) इसी विरोधाभास की वजह से "यदि योग्यतम ही श्रेष्ठ है तो कोई किसी गरीब की सहायता करने की बजाये किसी शक्तिशाली की दलाली करना ही पसंद करेगा." ये है भ्रष्टाचार की जड़. ज्यादातर चरित्र और संस्कार का ढोल पीटने वाले महापुरुष यौन क्रियाओं और मनोभावों के दमन को चरित्र की संज्ञा देते हैं.. यह विरोधाभास हमारे लूले लंगड़े सनातनी ज्ञान की शक्ति नगण्य बना देता है. उदहारण कृष्ण की 16800 रानियाँ थीं.. और किशोरावस्था में गोपिकाओं के साथ रास-लीला जैसी कल्पित कथाओं की देन है (कपोल कल्पित इसलिए क्योंकि यदि इसे सत्य मान लिया जाए तो आप अंदाजा लगा सकते हैं...) यदि विद्यार्थी जीवन की सनातनी परिकल्पना "काकचेष्टा, वकोध्यानम, स्वान-निद्रा तथैव च, अल्पहारी गृहस्त्यागी विद्यार्थिनः पञ्च लक्षणं" से विलग विदेशी प्रभावों (ज्यादातर नक़ल या अंधभक्ति ) को ही शिक्षा और विकास का आधार और परिभाषा मान लिया जाये तो मानसिक विरोधाभास उसी ओर जायेगा जिसके प्रेरण और आकर्षण अधिक होगा. ऐसे में संस्कारों की या चरित्र की कल्पना सिर्फ शाब्दिक ही रह जाती है. नतीजा सनातनी संस्कृति में जिस राजनीति का उद्देश्य जनकल्याण होना चाहिए विदेशी शक्तिशाली पराक्रम और बाजारीक व्यभिचार से वह राजनीति आज बाजारू वेश्या बन के रह गयी है... ये सिर्फ उदहारण हैं... और इसी पश्चिमीकरण का आप, मै और सभी किसी न किसी रूप में समर्थन कर ही रहे हैं तो क्यों न हम संस्कारिक मूल्यों को भी पश्चिमी तराजू में तौल कर ही निर्धारित करें.

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प्रिय रवीश, इस समीक्षा को अपने सादर संज्ञान में लेने के लिए आपका हार्दिक आभार... इस विषय पर दो पुस्तकें दो अलग-अलग लेखकों और इतिहासकारों के चिंतन और अनुसन्धान का परिणाम कही जा रही हैं.. मैंने सिर्फ उनके मीडिया रिव्यू का विश्लेषण किया है.. कुछ लिंक निचे आप लोगों के विवेचन के लिए दिए हुए हैं.. जमीन खरीदने की बात सूचना के अधिकार में मिले लूले लंगड़े जवाबो को आधार बना के लिखी है.. जो की आंध्र प्रदेश और केरल के तटीय इलाकों के सम्बन्ध में है. और इस जमीन पर २ वर्ष पूर्व खरीदने के बाद से कोई औद्योगिक कार्य नहीं हुआ है. कृषि सम्बन्धी विवेचन के लिए हरित क्रांति से आज तक के कार्यों और कार्य योजनाओं का पूरा ब्यौरा आप सूचना के अधिकार के तहत ले सकते है. आपको स्थिति स्पष्ट हो जाएगी.

के द्वारा:

@Jadoun sir...आशावादी होने का यह मतलब नहीं है कि किसी भी धारा में बहना शुरू कर दिया जाए. यदि हमारा वैचारिक उथलापन बना रहेगा तो हम परम सत्य की प्राप्ति नहीं कर सकते हैं. इस प्रकार के वैचारिक उथलेपन से हम जनाक्रोश तो उत्पन्न कर सकते हैं परन्तु गंतव्य के रूप में परम सत्य या जन कल्याण को प्राप्त करेंगे या नहीं यह मेरा प्रमुख संशय है.. आक्रोश उत्पन्न कर देना अलग बात है और वैकल्पिक और स्थायी विकल्प तक पहुँचाना अलग बात है. दोनों के तारतम्यता के बिना ऐसी ही परिस्थितियां हो सकती हैं की आप जन कल्याण के लिए काम करिए और दुसरे उसका फायदा अपने व्यक्तिगत हितों के लिए उठाने लगें. सावधानी में ही सुरक्षा है.

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अन्ना जी के आमरण अनशन के बाद जो देश भर में उनके समर्थन में जान सैलाब उमड़ा है वह जनता के आक्रोश एवं असन्तोष का प्रतीक है.देश का प्रत्येक नागरिक नेताओं के नित् नय खुलते घोटालों से खुद को ठगा स अनुभव कर रहा है,परन्तु उसे अवश्यकता थी एक ऐसे प्रतिनिधित्व की जो जनता को साथ लेकर चल सके,आन्दोलन की दिशा तय कर सके. सत्ता पर कबिज नेताओं की फौज इस प्रकार कुण्डली मारे बैठी है , उनके विरोध खडे होने वाले व्यक्ति की जुबान को येन केन प्रकारेण दबाते आए हैं परन्तु अन्ना हजारे एक एसी शक्सियत हैं जिनकी अवाज को नजर अन्दाज कर पाना आसान नही है.आपने पहले भी अपने गांव के विकास से लेकर सुचना अधिकार कानून लागू करने तक लम्बा संघर्ष किया है,और सफलता पूर्वक अपना उद्देश्य पूरा किया है.जनता को दिशा दी है संघर्ष करने की. लोकतन्त्र में जनता ही देश की मालिक होती है अतः यदि मालिक ही निष्क्रिय रहेगा तो पहरेदार तो मलाई चाट्ते रहेंगे. आम आदमी यही सोचता रहेगा की मेरे करने से क्या हों जयगा, मेरे आगे बढ्ने से मेरा क्या भला होगा, सिर्फ संकीर्ण सोच की निशानी है.जब देश उन्नति करेगा तो लाभ सभी को मिलेगा. जीवन स्तर सभी का उठेगाअब प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य बनता है की हजारे साहेब द्वारा शुरु की विचार क्रान्ति एवं आन्दोलन की ज्वाला को बुझने न दें.जब तक की भ्रष्ट नेता जेलों में नहीं पहुँच जाते और देश को साफ सुथरी व्यवस्था नही मिल जाती. यह लडाई हम सबकी लडाई है,यह लडाई हम सबके भले की लडाई है. आशावादी बनिए और देखिये आगे आगे होता है क्या ?

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क्या वाकई मै हम भ्रष्टाचार को भगाना चाहते हैं ? क्या वाकई में हम अन्ना के साथ है ? क्या हम यह कसम खाने को तैयार है कि हम भ्रष्ट तंत्र का हिस्सा नहीं बनेंगे ? ........ अगर हां तो शुरूआत सरकार को नहीं हमें करनी होगी....युद्ध अन्ना तो नहीं हमें लड़ना हो...गा.......हमें आज यह कसम खानी होगी की हम अपने किसी भी गलत काम के लिए, किसी भी काम को जल्दी कराने के लिए किसी भी सरकारी व प्राइवेट कर्मचारी को घूस नहीं देगें। कसम खानी होगी की हमारा काम चाहे न हो लेकिन हम किसी को पैसा नहीं देंगे। यदि हम यह नहीं कर पाते हैं तो यकीन मानिए दुनिया का कोई कानून भ्रष्टाचार को दूर नहीं कर सकता। हमारा हर वो कार्य भ्रष्टाचार की श्रेणी में आता है जिससे हम प्रत्यक्ष और प्रत्यक्ष रूप से अपनी सरकार को व अपने मालिक को आर्थिक चोट पहुंचाते हैं।.........महान समाज सेवी अन्ना हजारे के साथ मीडिया में आने के लिए आज मैं उन लोगों को भी देख रहा हूं जिनका कार्य कहीं न कहीं भ्रष्टाचार की नींव पर ही शुरू होता है या खड़ा है। फिर चाहे वह फिल्म स्टार हो, कोई बाबा हो या समाज के किसी भी वर्ग का आदमी हो.......अन्ना हम तुम्हारे साथ हैं सिर्फ इतना कहने मात्र हम अन्ना के साथी नहीं बन जाते हैं.....................भ्रष्टाचार के खिलाफ यह जंग तब तक अधूरी रहेगी.........जब तक हम अपने अंदर के भ्रष्ट इंसान को खत्म नहीं कर देते.........जय हिंद ........भारत

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